एस्ट्रोलॉजी ओर सूर्य गृह

ऐस्ट्रॉलजी और सूर्य गृह

हमारे भारतीय ऐस्ट्रॉलजी में सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है। जन्म पत्रिका मे परिवार के परिप्रेक्ष्य में सूर्य पिता का प्रतिधिनित्व करता है। सूर्य की विंशोत्तरी दशा 6 साल की होती है।

सूर्य का अयन 6 माह का होता है। 6 माह यह भूमध्य रेखा के दक्षिण में (दक्षिणायन) रहता है, और 6 माह यह भूमध्य रेखा के उत्तर में (उत्तरायन) रहता है। मूल त्रिकोण सिंह राशि पर 0 डिग्री से लेकर 10 डिग्री तक अति-फ़लदायी होता है। अधिक बली होने पर जातक राजा तुल्य हो जाता है।

सूर्य की मित्रता चन्द्र मंगल और गुरु से हैं।
सूर्य की शत्रुता शनि और शुक्र से हैं।
सम ग्रह बुध है।
मेष के 10 अंश पर उच्च का और तुला के 10 अंश पर नीच का होता है।

सूर्य के
देवता भगवान शिव हैं।
दिशा पूर्व है।
ऋतु गर्मी है।
नक्षत्र कृतिका, उत्तराषाढा और उत्तराफ़ाल्गुनी हैं।
द्रिष्टि सप्तम द्रिष्टि है।
जाति क्षत्रिय है।
लिंग पुरुष है।
रंग केशरिया है।
रत्न माणिक है।
स्थान भव्य मन्दिर-महल-किला, जंगल एवं नदी का किनारा है।
राशि स्वामी पांचवीं-सिंह राशि है।
कारक धातु स्वर्ण आभूषण तांबा है।

शरीर में सूर्य चेहरे आंख ह्रदय पेट और सम्पूर्ण हड्डियों के ढांचे का प्रतिधिनित्व करता है।

रोग सूर्य ग्रह के कमजोर होने के कारण ही आंख,सिर,उच्च/निम्न रक्तचाप, पित्त रोग, बालों का झड़ना गंजापन एवं ज्वर आदि विकार होते हैं। ऐसा माना जाता है जिस जातक की जन्म पत्रिका में सूर्य अष्टम (मृत्यु) स्थान से सम्बन्धित होने पर जातक की मृत्यु अग्नि से होना संभव है।

राजीव थानवी
सुप्रभातम-ग्रुप (9414604540)

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