श्राद्ध-पक्ष-महत्त्वम

सुप्रभातम-श्राद्ध-पक्ष-महत्त्वम

पित्त्तरों की आत्मा की तृप्ति के लिए जो भी श्र्द्धा पूर्वक किया जाय, उसे श्राद्ध कहते है। यह पक्ष जोकि भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों का होता है, को पितृपक्ष अथवा श्राद्ध पक्ष कहा जाता है इसमें जातक अपने परिवार के किसी भी सदस्य के मृत्युपरान्त उनकी स्मृति बनाए रखते हुए उनके प्रति अपनी श्रद्धा भाव से उनकी तृप्ति के लिए सेवा, दान-पुण्य करते हैं।

मत्स्य पुराण में तीन प्रकार के श्राद्ध प्रमुख बताये गए है, जिन्हें नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य श्राद्ध कहते हैं।
यमस्मृति में पांच प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता है, जिन्हें नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि और पार्वण श्राद्ध कहते है। जिसमे श्राद्ध पक्ष में पार्वण श्राद्ध की अत्यधिक महतत्ता बताई जाती है।
धर्मसिन्धु के अनुसार पितरों की संतुष्टि हेतु 16 तरह के श्राद्ध और विभिन्न पित्र-कर्म का विधान है।

हमारे धर्मग्रंथों में उल्लेखित- पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण ये तीन प्रकार के ऋण मनुष्य पर प्रमुख माने गए हैं। इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितृ ऋण में पिता के अतिरिक्त माता तथा परिवार के सभी बुजुर्ग भी सम्मिलित हैं, जिनका हमारे जीवन के विकास में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष योगदान रहा। पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। यथा दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात् ही स्व-पितृ तर्पण का क्रमबद्ध विधान माना जाता है।

सम्पूर्ण विश्व में श्राद्ध तर्पण हेतु केवल मात्र दो स्थान-बोध गया (फल्गु नदी) और विष्णुपद मन्दिर ही प्रसिद्द है जोकि बिहार में स्थित है वैदिक पुराणों में वर्णित श्री रामचरित में श्री राम द्वारा श्री दशरथ और जटायु को गोदावरी नदी पर जलांजलि देने का उल्लेख मिलता है एवं भरत का राजा दशरथ के दशगात्र विधान का उल्लेख तुलसी कृत रामायण में मिलता है। इस सन्दर्भ में कर्ण के पुनर्जन्म की कथा भी काफी प्रचलित है। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सभी कार्य सिद्ध होते हैं उसके कुटुंब और जीविकोपार्जन में सदेव उन्नति होती है।

हमारे पौराणिक धार्मिक ग्रंथों के मतानुसार मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति को प्रेत योनी में माना जाता है। सूक्ष्म शरीर जिसे आत्मा कहते है, भौतिक शरीर छोड़ने के पश्चात सभी प्रेत श्रेणी में आते है, जिन्हें फिर दो श्रेणियों में बांटा-एक वे जिनके अन्दर मोह, माया, घृणा, तृष्णा, भूख और प्यास का समावेश होता है, उन्हें प्रेत अथवा भूत कहा गया। दूसरे वे जो इन सब से तृप्त हों उनके अन्दर किसी प्रकार की मोह, माया, घृणा, तृष्णा, भूख और प्यास न हो वे हमारे पूजनीय पितर देवता कहलाये।

ऐसा माना जाता है कि ये पूजनीय पितृ आत्माए इस माह में ब्रह्मांड से पृथ्वी लोक पर 15 दिन भ्रमण करने आती है। ये पितृ पशु पक्षियों के माध्यम से हमारे निकट आते हैं. इनके लिए श्राद्ध कर्म में भोजन के पूर्व पांच जगह पर अलग-अलग भोजन का सूक्ष्म अंश निकालकर गाय, कुत्ता, चींटी और देवताओं को पत्ते पर तथा कौवे को भूमि पर सूक्ष्म अंश अर्पित किया जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कुत्ता जल तत्त्व,चींटी अग्नि तत्व, कौवा वायु तत्व, गाय पृथ्वी तत्व और देवता को आकाश तत्व का प्रतीक माना जाता हैं. इस प्रकार इन पांचों को सूक्ष्म भोजन देकर हम पंच तत्वों को संतुष्ट करते हैं, केवल गाय में ही एक साथ इन्ही पञ्च तत्वों का समावेश होता हैं. अतः पितृ पक्ष में गाय की सेवा करना विशेष फलदाई माना जाता है.पितृपक्ष में जो तर्पण-जिसमे पितर आत्मा के पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जौ तथा चावल का पिण्ड और विभिन्न पकवान देता है, जिसे कुत्ता, कौवा, चींटी, गाय और देवता के माध्यम से उसमें से थोडा अंश लेकर सभी पितर आत्माए शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ब्रह्मांड में पुनः लौट जाते हैं। इसलिए इस पक्ष को पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है। इस प्रकार हमें उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

राजीव थानवी
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